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Saturday, 7 March 2020

मार्च

                                 
                                              मार्च महीना
                       ज़िबह को तैयार
                            अडेनियम

(Image from Google)

Saturday, 1 June 2019

आग ...

                                                आग ही आग 
                                                बुरांश सब ओर 
                                                मन जंगल 

                                                             आग ही आग 
                                                          बुरांश के जंगल 
                                                                 मन बाहर 



Saturday, 3 December 2016

अकेली

                         1-247
                                                                              Image source

प्यारे दोस्तों,
सुश्री मनिपर्णा सेनगुप्ता मजुमदार का अँग्रेज़ी हाइकु  'alone'  मुझे इतना अभिभूत कर गया कि कई दिनों तक वो मुझ पर हावी सा रहा.
उनकी अनुमति से मैंने भी इस ही विषय पर लिखने की कोशिश की है.  मेरे चार हिन्दी हाइकु मूल अँग्रेज़ी हाइकु के तीन objects : चिड़िया,  दीवार,  विधवा;  और एक भाव : अकेलापन  के  इर्द-गिर्द  ही  घूमते हैं,  (मैंने अपनी रचनाओं को मनिपर्णा के हाइकु से प्रेरित नहीं कहा है, क्योंकि प्रेरणा विचार की होती है जबकि इनमें से किसी में भी विचार मेरा original नहीं है, मेरे चारों हाइकु में विचार मनिपर्णा ही का है).  लेकिन मैंने अपने हाइकु(ओं) में कुछ विशिष्ट शब्दों का प्रयोग किया है जिनसे उनका क्षेत्र विस्तृत हो गया है और उन्हें नए आयाम, नए अर्थ मिले हैं.
मेरा मानना है कि  मौलिकता  भी विचार की होती है, शब्द केवल आवरण मात्र हैं .. मैंने मनिपर्णा के विचार को मात्र कुछ अन्य शब्द पहनाये हैं,  और इसी कारण से मनिपर्णा को ही अपने हाइकु(ओं) की भी मूल रचयिता मान कर ये पोस्ट मैं ससम्मान उन्हें समर्पित करता हूँ!
आप सब सुधि पाठकों के समक्ष व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं समझता, केवल आपका ध्यान 'ख़ामोशी', 'परकोटे' और 'संग' के प्रयोग की ओर आकृष्ट करना चाहूँगा जिन्होंने हाइकु(ओं) को बहुआयामी अर्थ दिए हैं.
अहिन्दीभाषी मित्रों का प्रोत्साहन मुझे हमेशा मिला है.. उनकी सहायता के लिए key उपलब्ध है.

 1.
गूँगी चिरैय्या
बियावान  दीवारें
विधवा सखी

 2.
तन्हा  गोरैया
भरभराता घर
बेवा ख़ामोशी

3. 
उदास  पंछी
परकोटे पे काई
संग वैधव्य

4.
अकेली जान
डगमगाता जहाँ
चिड़िया, बेवा!

Key :
बियावान = deserted
तन्हा = lonely/lonesome
भरभराता = crumbling
बेवा = widow
परकोटा = parapet
काई = moss/mossed
संग = with/white stone ‘संगमर्मर’
वैधव्य = widowhood
जहाँ = world

                     This post is dedicated to Maniparna Sengupta Majumder





Wednesday, 11 May 2016

ठूँठ


कोयल रोये
कितने पेड़ कटे
ठूँठ उदास

Image from Google





Saturday, 2 April 2016

ज्ञानी


तुम तो ज्ञानी
कैसे बूझोगे भला
दर्द पहेली

Saturday, 26 March 2016

हँसी-ख़ुशी


होठों पे हँसी
खोखली सब ख़ुशी
आँखें उदास


Sunday, 20 March 2016

यादें


खोली किताब 
हो गईं ताज़ा यादें 
सूखा गुलाब 
Image from Google



Tuesday, 1 March 2016

बेबस


भागती धार 
बंधी किनारे देखे 
बेबस नाव 
Image from Google



Tuesday, 5 January 2016

सिपाही


सिपाही मेरे
मर रहे बेमौत
नेता ख़ामोश 

Wednesday, 30 December 2015

रीता


रीता ही रहा
बारिश झमाझम
उल्टा मटका

Tuesday, 29 December 2015

आग़ोश


लेता सबको
आग़ोश में अपने
जवान पेड़

Sunday, 27 December 2015

आस


रोटी खाऊँ मैं
या खा रही मुझको
रोटी की आस


Tuesday, 15 December 2015

घर


भरा है घर
सामान ही सामान
कहाँ रहूँ मैं 

This post is dedicated to Geetashree Chatterjee who lambasted me for doing away with symbolism in my haiku here...I thank her for this favour!


Monday, 30 November 2015

सिलसिला


मुसलसल
है एक सिलसिला
तन्हाइयों का

Key:
मुसलसल = continuous


शायद


देखो सुबह
शायद मुस्कुराये
मेरा भी दिन

बे-लगाम


वहाँ पे तिल
ये दिल बे-लगाम
हुआ गुलाम

Friday, 6 November 2015

प्यास


ख़ुश्क हो चले
थरथराते होंठ
किसी प्यास में

Tuesday, 20 October 2015

उधार


कैसे जियूँ ये
उधार की ज़िन्दगी
कब तलक

Saturday, 17 October 2015

कमबख़्त


उम्र बढ़ती
हसरतें अधूरी
'कमबखत' !

Tuesday, 13 October 2015

नंगी


क्यों ढकूँ सिर
मन्दिर या मस्जिद
रूह तो नंगी 


This post is dedicated to Geetashree Chatterjee for her ameliorated and refined version of this haiku.
She says:

बिखरे बाल
मन्दिर या मस्जिद
रूह आज़ाद

She has done an awesome job by transforming the vehicle (bailgaadii to Mercedes) without disturbing the passenger inside (the thought!)
I appreciate the fact that her version, in spite of its superiority, doesn’t make the original feel inferior in any way…both of them put together give a feeling as if you are reading Kabir and Eliot on the same pageJ