जानता हूँ मैं कि
तुम उच्च-वर्गीय कुलीन
शैम्पू-पाउडर से गमकते
घूमते हो मर्सिडीज़ में
और मैं खुजैला अपाहिज
जिसके होंगे कई बाप
मक्खियों से भिनकता
रहता हूँ हलवाई के नीचे की
नाली में.
हाँ, मानता हूँ मैं कि
तुम रहते हो
खूबसूरत मालकिन के
एयर-कंडीशन्ड बँगले में, बाँहों में
और मैं उस दिन को
खुशकिस्मत मानता हूँ
जब मुझे दस बीस
लात-डण्डे न पड़ें.
तुम्हारा मूड बिगड़ जाता है
जब मालकिन जाती है विदेश
हफ्ते दस दिन को
हो जाते हो तुम गुमसुम
और इम्पोर्टेड न्यूट्रिशन खाने में
करते हो नख़रे
मैं भी तो हो जाता हूँ
थोड़ा कटखना
जब जूठे दोने-पत्तल
नहीं मिलते दंगे के दिनों में.
मुझे तुमसे प्यार नहीं :
तुम कहाँ-मैं कहाँ
न ही रश्क़ है मुझे तुमसे :
क़िस्मत अपनी-अपनी,
पर फिर भी
तुम्हारा आदर करता हूँ मैं
क्योंकि हमारी नस्लें
जुदा होते हुए भी
हैं तो आख़िर हम कुत्ते ही !
न जाने तुम
मुझसे घृणा क्यों करते हो..
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