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Thursday, 20 August 2015

इसरार


चलो जाने दो, सुनो
मुँह मत  फेरो मगर
नज़्म मेरी ताज़ी है
बासी अख़बार नहीं है!

36 comments:

  1. Everlasting expressions don't stale with time. :-) Wonderful Amitji !

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    1. Thank you Geetashree for sensing the fragility..:)

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  3. बहुत शानदार !!

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  4. नज्म है तो ताज़ी ही होनी चाहिये

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  5. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (23-08-2015) को "समस्याओं के चक्रव्यूह में देश" (चर्चा अंक-2076) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. Thank you Dr. Shastri. I am grateful..

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  6. नज़्म तेरी ताज़ी है....

    बहुत सुंदर.

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