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Sunday, 5 January 2014

सर्द रातों में...


तल्खियाँ मेरे दोस्तों 'हमदर्द' की 
सर्द रातों में देती हैं तपिश सी ..!
Translation:
The bitterness of my friends 'sympathetic'
keeps me simmering in chilly winter nights!
(Implied: I'm thankful to them.)

Saturday, 2 November 2013

भूला गया

दीवला हूँ कोरी मिट्टी का,
पार-साल का.

मुझ तक आते आते 
तुम्हारी मुँडेर ही ख़त्म हो गयी 
और मैं बच रहा 
जगमग पंक्ति से.

करता रहा इन्तेज़ार साल भर
कि शायद 
चौबारे या चौराहे 
पर रख आओ.

नववर्ष, जन्मदिवस,
पूजा-पाठ में जलाओ
या किसी आत्मा-शांति के लिये
गंगा में ही बहाओ.

पर मैं तो ताक़ पड़ा भूला रहा
डरता हूँ इस साल 
नयों के नीचे
दबा न रह जाऊँ!

Friday, 25 October 2013

बेकार

फेंका नहीं जा सकता
बेचा भी नहीं,
ना दान दिया जा सकता हूँ
और उपहार में तो बिल्कुल ही नहीं.

सजता था कभी 
सजाता भी,
क़ीमती हुआ करता था
और उपयोगी भी.

पुराने फ़ैशन का
शानदार फ़र्नीचर हूँ मैं,
नये चलन के इस दौर से
मेल नहीं खाता.

...पर मेरे जैसे अब
बनते भी कहाँ हैं!