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Saturday, 2 November 2013

भूला गया

दीवला हूँ कोरी मिट्टी का,
पार-साल का.

मुझ तक आते आते 
तुम्हारी मुँडेर ही ख़त्म हो गयी 
और मैं बच रहा 
जगमग पंक्ति से.

करता रहा इन्तेज़ार साल भर
कि शायद 
चौबारे या चौराहे 
पर रख आओ.

नववर्ष, जन्मदिवस,
पूजा-पाठ में जलाओ
या किसी आत्मा-शांति के लिये
गंगा में ही बहाओ.

पर मैं तो ताक़ पड़ा भूला रहा
डरता हूँ इस साल 
नयों के नीचे
दबा न रह जाऊँ!

13 comments:

  1. बहुत सुन्दर
    दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं !
    नई पोस्ट आओ हम दीवाली मनाएं!

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    1. धन्यवाद कालीपद.
      आपको भी:

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  2. As the New year starts it is better not to see the past years which are now spine in the memories. Very nicely composed particularly the last stanza .r

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (04-11-2013) महापर्व दीपावली की गुज़ारिश : चर्चामंच 1419 "मयंक का कोना" पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    दीपावली के पंचपर्वों की शृंखला में
    अन्नकूट (गोवर्धन-पूजा) की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. धन्यवाद डॉक्टर शास्त्री.
      आभारी हूँ.

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  4. Replies
    1. Ha..ha..ha:) If you say so:)
      Thank you bro:)

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