मत सजाओ कागज़ के फूलों से,
इस से तो ये गुलदान सूने ही अच्छे हैं.
मत करो दिल्लगी मद्धम चराग़ों से,
इस से तो ये गलियारे अँधेरे ही अच्छे हैं.
फिर कहोगे बात कोई चुभती हुई सी,
इससे तो सिलसिले-बयान ख़ामोश ही सच्चे हैं.
क्यों दिखाते हो चिंगारी मेरे अरमानों को,
इस से तो ये पटाखे सीले ही अच्छे हैं.
मत लगाओ हमदर्दी का मरहम बेमानी,
इस से तो ये ज़ख्म ताज़े ही अच्छे हैं.
क्यों करूँ दस्तख्वत इस्तीफ़े पे ज़िन्दगी के,
इस से तो ये कागज़ात कोरे ही पक्के हैं.