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Sunday, 30 September 2012

Thirsty...


Me a thirsty shell
longing for a drop divine.
The matter merely:
not a sea bottom,
buried was I
under sand dunes dry!



प्यासा...

मैं इक प्यासा सीप
तरसा किया हमेशा
इक बूँद ख़ास को.
फ़र्क़ फ़क़त इतना कि
तलहटी समन्दर नहीं,
दफ़्न था मैं
ख़ुश्क रेगिस्तान में!

Friday, 28 September 2012

Monochrome: Branches

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Thursday, 27 September 2012

Skywatch...through the lake!

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Linked to Green Day

Wednesday, 26 September 2012

Wellbeing...


Friends avoid asking about
my wellbeing these days
is it pain reflecting on my face
or are they afraid I might
tell the truth as well?

हाल...

हाल अब मेरा पूछने से 
कतराने लगे हैं लोग..
दर्द या तो झलकने लगा है चेहरे पे
या सच ही न बता दूँ कहीं
ये सोच के घबराने लगे हैं दोस्त!

Sunday, 23 September 2012

Incomplete...


My nomadic soul
drifts about restless,
without head
my body
seethes on a pyre,
in smoke
of damp wood.

अधूरा...

रूह     मेरी        आवारा 
और    बदन  बे-सर  है,
चिता बरसाती लकड़ी की
बस  धुआँ-धुआँ  भर  है!

Friday, 21 September 2012

Monochrome: Victorian Stairs-1

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Thursday, 20 September 2012

Skywatch...colors!


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Wednesday, 19 September 2012

..and Monsoon in Nainital-2



धरती की झील
आसमान पर बादल
मिलने को तरसते
इस हसरत को बस
सपना ही समझते.

बूँदें बरसतीं 
लगातार-अनवरत
कितनी सहजता से
दोनों को मिलातीं
इक सपने को
हक़ीक़त बनातीं!





मंदिरों के घंटे
अजान की आवाज़
ख़ामोश खड़े चर्च
गुरूद्वारे का प्रसाद..
कितने ख़ुशनसीब हो तुम
नैनीताल
ख़ूबसूरती के अलावा भी
कितना कुछ है
तुम्हारे पास!





Grand Hotel
you are Grand!
not only in name
but in spirit as well.
Your grandeur reflects
not only in your age
of 150 years,
but in your ambience too.

I like that
you don’t allow
car-park and alcohol
on your premises,
it causes me
inconvenience though,
but I’m happy
you remain
unpolluted too!

Please preserve it
as long as you can
and save yourself
from the
selfish man.

People may think
you’re old fashioned
and out of date
but I love you
because
you don’t follow fashion
and ignore date!







Tuesday, 18 September 2012

Nainital in Monsoon-1



ये धुंध नहीं 
बादल नहीं
बारिश नहीं
परमात्मा बरसता है..
लगाओ टकटकी
आसमान पर
खोल कर बंद 
दरवाज़े अपने दिल के
और तुम भर जाओगे,
जाओ शोर-ओ-गुल में
नज़रंदाज़ कर इसे
बाज़ार-ओ-दूकान के
और तुम ख़ाली रह जाओगे.





मेघ बरसता है
छतरियाँ रंगीन
दिल भी बरसता है
पर रंग कहाँ?





बारिश बहुत प्यारी
ख़ामोश बरस गयी
न टप-टप
न झर-झर
न शोर
न आडम्बर!






Wednesday, 12 September 2012

Sunday, 9 September 2012

विपस्सना: / Vipassana:


September 2007:
This piece was written 5 years back after I attended a 10 days Vipassana Meditation Course at Dhamma Salila, Chakrata Road, Dehradun.
Unlike other poems where certain things are added on as the poet’s creative imagination, this one is a true account of my ‘near enlightenment’ experience in that absolutely wonderful, out of this world place. I humbly urge my valued readers that it is not a work of art to be enjoyed, but a deep truth to be understood!
(...wanted to present it in English too but couldn’t come up to my expectations..failed to put soul in words..any friends willing to help are most welcome.)

सितम्बर 2007:

दस दिन के उस कठिन साधना शिविर में
हम से कहा गया था कि
अपने अन्दर देखें 
केवल अपने ही अन्दर देखें,
सभी इन्द्रियगत अनुभूतियों की
उपेक्षा करें,
और जानें कि सब कुछ
भंगुर है, नश्वर है, क्षणिक है, अनित्य है!

मुझे चारों ओर
पेड़ों में,पौधों में,
पहाड़ों में. नदियों में, झरनों में,
सूर्योदय, सूर्यास्त में,
चाँद, तारों, आकाश में
तुम ही तुम दिखाई दिए
मैंने प्रयास किया कि 
मैं कुछ ना देखूँ
और मैंने आँखें बंद कर लीं!

लेकिन पक्षियों के गीतों में,
अनजान कीटों की रहस्यमयी ध्वनियों में,
पत्तियों की सरसराहट में,
झरनों और नदियों की कलकल में,
दिनों के मौन में, अनाहद के नाद में,
मुझे तुम्हारी आवाज़ सुनाई दी
चारों तरफ़ सिर्फ़ तुम्हारी ही आवाज़ 
सुनाई देती रही..
मुझे याद आया कि कुछ नहीं सुनना है
और मैंने कान बंद कर लिए!

लेकिन फूलों की ख़ुशबुओं में
वनस्पतियों की महक में
नदी किनारे, पहाड़ों की तलहटी में,
अनोखी रहस्यमयी गंधों में,
मुझे तुम्हारी ख़ुशबू आई,
हमेशा चारों ओर सिर्फ़ तुम ही तुम
महक रहे थे...
मुझे फिर याद आया कि
कुछ नहीं सूंघना है, और मैंने
ख़ुशबुओं की तरफ़ ध्यान देना बंद कर दिया!

लेकिन ताज़ी, ठंडी, राहत भरी
मस्त पहाड़ी हवा के झोंके
मुझे छेड़ते-सहलाते रहे,
और मुझे तुम्हारे स्पर्श का अहसास
आनंदित-आल्हादित करता रहा,
करता ही रहा...

मैंने बहुत चाहा  
कि उससे अछूता रह जाऊँ..
लेकिन कैसे?
आखिर थक-हार कर मैंने
अपने सब प्रयास गिरा दिए,
और खुद को तुममें भुला दिया!

मेरी साधना अधूरी रह गयी क्योंकि
मैं उसे न ढूंढ पाया जो 
नश्वर है, क्षणिक है, भंगुर है, अनित्य है...
लेकिन बिना साधना के 
मुझे वो मिल गया
जो अनश्वर है, सनातन है, शाश्वत है, सत्य है-
तुम!! 





Friday, 7 September 2012

Wednesday, 5 September 2012

Sky watch...horizon

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Sunday, 2 September 2012

Commodities...


When everything
has a cost
and an expiry date,
I wonder why
happiness
doesn’t have a price-tag
and MY sorrow
an expiry date!